देहरादून– दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से आज सायं केन्द्र के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मराठी रंगभूमि पर एक व्याख्यान आयोजित किया गया. यह व्याख्यान युवा सामाजिक अध्येता अम्मार यासिर नक़वी द्वारा दिया गया। यह व्याख्यानशोध के साथ ‘क्षेत्रीय साहित्य का अंग्रेजी अनुवाद’ श्रृंखला का 9वां सत्र था। व्याख्यान में मराठी नाट्य परंपराओं के विकास की झलक प्रस्तुत करने के साथ वहां के भाषाई और सामाजिक इतिहास पर भी व्यापक प्रकाश डाला
अम्मार यासिर नक़वी ने इस व्याख्यान में मराठी रंगमंच की सामाजिक-राजनीतिक, लोक और विविधतापूर्ण उत्पत्ति का समग्र दृष्टिकोण तथा अन्य साहित्यिक अभिव्यक्तियों के साथ इसका अंतर्संबंध। आयातित परंपराओं व भौगोलिक क्षेत्रों से लेकर तमाशा, नाट्य संगीत, पारसी और आधुनिक रंगमंच जैसे रूपों तक इसके विकास की गहन पड़ताल सभागार में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष रखी।
ऑडियो-विजुअल माध्यम से मराठी रंगमंच पर इस संवादात्मक सत्र में अम्मार ने इस व्याख्यान सत्र को नाटक के प्रारूप पर आधारित तीन भागों में विभाजित कर अपनी बात रखी।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने शास्त्रीय मराठी भाषा और संत तुकाराम तथा बाद में पेशवा शासन के दौरान विकसित हुई विद्रोही प्रकृति का संक्षिप्त परिचय दिया। उन्होंने दैनिक जीवन में नाटक के महत्व, नौटंकी, पर्दा और संवाद जैसे शब्दों और नाट्य परंपराओं में उनकी उत्पत्ति पर भी सम्यक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और अभिनवगुप्त की अभिनवभारती आधुनिक यूरोपीय रंगमंच से पहले के प्रेरणा के स्रोत रहे हैं और अब तमाशा, लैत और दशावला जैसी लोक परंपराओं ने आधुनिक नाटक की नींव रखी है।
व्याख्यान में नाट्य परंपराओं के मूल सिद्धांतों पर भी चर्चा की गई। विभिन्न क्षेत्रों और उनके अग्रदूतों, जैसे बंगाल में बाकल सरकार, हिंदी भाषी क्षेत्र में मोहन राकेश, कर्नाटक में करनाड और मराठी नाट्य जगत की विविधता का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। अम्मार ने आत्मनिरीक्षण और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रारंभिक विरोध के रूप में नाटकों के विकास के ऐतिहासिक कारणों पर भी प्रकाश डालने की कोशिस की ब्रिटिश शासकों द्वारा 1876 के नाट्य प्रदर्शन अधिनियम के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास को भी रेखांकित किया गया। विकास की दो धाराओं पर बल देते हुए 1830 के दशक से वर्तमान तक के नाटकों का कालानुक्रमिक क्रम, प्रारंभिक यक्षगान-प्रेरित नाटक, पौराणिक नाटक, ‘किताबी नाटकों’ का उदय, शेक्सपियर के नाटक, बाल गंधर्व जैसे शास्त्रीय संगीतकारों के समावेश वाले संगीत नाटक और आधुनिक नाटक को भी रेखाकिंत किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मराठी नाटक जगत को जो चीज खास बनाती है, वह है समानांतर परंपराओं का अस्तित्व, जो फुले और अंबेडकर से प्रेरित नाटकों से लेकर तिलक के राजनीतिक नाटकों, पारसी थिएटर, मुंबई के औद्योगिक केंद्र में श्रमिकों के नाटकों और आधुनिक प्रयोगात्मक नाटकों तक फैली हुई हैं।
अंतिम सत्र में उन्होंने दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से दिखाया कि कैसे विष्णुदास भावे और उनकी ‘सीता स्वयंवर अख़्यार’ से लेकर अन्ना साहब किर्लोस्कर और उनके नाटक मंडली राम गणेश गडकन तक, और आधुनिक तिकड़ी विजय तेंदुलकर, मनीष एलकुंचवार और सतीश अलेकर तक, प्रत्येक लेखक अपने प्रभाव से साहित्य को आकार देने का प्रयास किया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में चन्द्रशेखर तिवारी, कार्यक्रम अधिकारी ने अतिथि कक्ता साहित सभागार में उपस्थित लोगों का स्वागत किया और अम्मार नकवीं द्वारा प्रस्तुत दक्षिण व पूर्वोत्तर भारतीय भाषा – साहित्य श्रृखंला के नवें एपिसोड के लिए उन्हें शुभकामना दी और कहा अन्य भारतीय साहित्य,भाषा के सामाजिक इतिहास पर जानकारी प्रदत्त करने का उनका यह प्रयास महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम के दौरान साहब नकवी, पुस्तकालय अध्यक्ष डाॅ. डी. के. पाण्डे, सुंदर सिंह बिष्ट, आलोक सरीन, नवल किशोर शर्मा, के बी नैथानी, देवेन्द्र काण्डपाल, राकेश कुमार सहित
पाठकगण, लेखक व साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे ।